चापलूसी की चाशनी

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चापलूसी की चाशनी बहुत मीठी है जनाब,
लिखते चापलूस इससे कामयाबी की किताब।

हाथ जोड़कर करते हैं ये दंडवत प्रणाम,
बनते है फिर इससे इनके बहुत सारे काम।

बिन खर्चे बन जाते हैं यह तो खासम खास,
जब बोलते रहते हरदम ‘यस बॉस’ ‘यस बॉस’।

पाने को जीवन में हर मौके पर अवसर,
लिए रहते हैं यह दीनता अपने चेहरे पर अक्सर।

करते रहते हमेशा अपने ‘बॉस’ की जय जयकार,
भइया तभी तो मिलता है इनको हरदम ‘बोनस’ तैयार।

‘बॉस’ के आसपास गुड़ की मक्खी की तरह मंडराते,
दांत दिखा कर मौका पाकर चरणों में झुक जाते हैं।

‘बॉस’ की पसंद ना पसंद का लगा कर अनुमान,
तलवे चाटकर उनके बने रहते उनके गुलाम।

‘बॉस’ का करते रहते है हरदम ये गुणगान,
चापलूसी को बना लेते हैं ये अपना भगवान।

‘बॉस’ को आते देखकर तुरंत ठोकते हैं सलाम,
भैया तभी तो आते हैं इनके जीवन में खुशियों के पैगाम।

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