अंतर्द्वंद

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तारों का उत्सव अब विश्राम ले रहा था। सूरज की छुटपुट किरणें स्वर्ण मल्लिका के समान तमस को पराजित करने को प्रतिबद्ध थीं।

जो नहीं पराजित हो पा रहे थे वे थे स्वयं पंडित रामनाथ शास्त्री के मन के भाव। विगत एक सप्ताह से स्वयं का स्वयं से युद्ध जारी था।

शहर के धनाढ्य व प्रभावित लोगों में से एक जीवन दास द्वारा संचालित ‘जीवन दास संगीत महाविद्यालय’ के शिक्षक ही नहीं प्राण थे रामनाथ शास्त्री, जिन के संरक्षण में अनगिनत प्रतिभाऐं अपने लक्ष्य तक पहुंची थी।स्वयं को पालक नहीं, सेवक मानते थे वह संस्था का।

उनकी सौम्यता व सरलता के कारण ,जीवन दास की मलिन छवि के विपरीत,  संगीत विद्यालय दूर क्षेत्र तक अपना प्रभाव छोड़ने में सफल था।

बढ़ती प्रसिद्धि के चलते जीवन दास पूर्णता रामनाथ शास्त्री पर अपने विद्यालय का दायित्व डाले निश्चिंत थे । पर आज रामनाथ शास्त्री अपने दायित्व व मनःस्थिति से तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे।

सप्ताह पूर्व जब करुणा की सजीव मूर्ति चित्रा अपने दस वर्षीय पुत्र सुकेतु को उनके सम्मुख संगीत शिक्षा की अनुनय लेकर आई। तब उन्हें भली भांति ज्ञात था कि यह वही चित्रा है जिसने वैधव्य के प्रारब्ध को पूर्णता नकार कर उस मनुवादी समाज को तिलांजलि दे दी थी ,जिसका प्रतिनिधित्व जीवनदास सरीखे लोग करते थे।

पति के ना रहने पर संपत्ति व स्वयं पर सामाजिक लोभ का उसने प्रतिकार किया था। जिसके फलस्वरूप जीवनदास सरीखे लोगों का समूह अपने विरुद्ध तैयार कर लिया था।

इसी के चलते अब सुकेतु की संगीत शिक्षा में जीवन दास की अनुमति बाधक थी।

जब चित्रा के हठ पर सुकेतु का मधुर गायन सुना तो वह भली-भांति समझ गए कि बालक के गले में साक्षात सरस्वती विरजती हैं। पर जीवन दास के प्रति पूर्णता निष्ठा रखने पर उन्होंने शिक्षा देने से मना कर दिया।

प्रतिदिन भोर में ही चित्रा को सुकेतु के साथ विद्यालय के आगे शिक्षा याचक के रूप में खड़े देखकर रामनाथ शास्त्री अंतर्द्वंद की स्थिति से गुजर रहे थे। मना करने के बाद भी चित्रा की याचना पूर्ववत ही थी।

एक दिन शाम को मंदिर से लौटते समय उत्सुकतावश उनके कदम चित्रा के घर की ओर मुड़ गए।

चित्रा के घर से निकलते सुकेतु के मधुर स्वर, संध्या बेला को अनुप्राणित कर रहे थे। उस समय उन्हें स्वर्गीय आनंद की प्राप्ति हुई। आनंद ने अंतर्द्वंद पर विजय पा ली थी।

अगली भोर तमनाशक थी। विद्यालय के सामने खड़ी चित्रा व सुकेतु को देख अब रामनाथ शास्त्री ने आगे बढ़कर सुकेतु का हाथ थाम लिया।

सुकेतु को अंदर विद्यालय में ले जाते हुए रामनाथ शास्त्री को पिछली संध्या में जीवन दास को लिखे पत्र का स्मरण हो आया, जिसमें उन्होंने लिखा था,” मैं आपका सेवक व मां सरस्वती का उपासक हूं। मां ने मुझे सुकेतु के रूप में अपनी उपासना का आदेश दिया है। और मैं इस उपासना के साथ ही विद्यालय की और आपकी सेवा कर पाऊंगा।”

सुकेतु के साथ अंदर विद्यालय में जाते हुए पीछे मुड़कर देखा, चित्रा का शुष्क मुख प्रसन्नता की आद्रता से नम था।

 

✍️Dr.Shubhra Varshney 

 

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