शहर रैन बसेरा

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शहर… रैन बसेरा

क्या सफर और कैसी मंज़िल,
ज़िंदगी ढूंढे अब नया सवेरा।
फिर गुलज़ार हो आबाद हो,
शहरों का रैन बसेरा।

याद आता है मुकद्दर रात के चिरागों का,
बाजार होते थे रोशन जिनसे।
बही हवा जो दहशत की,
बुझ ही गए हैं अब वह शाम से।

जलती धूप में पड़ गए छाले,
निकले जा रहे कहां डालें डेरा।
शहर तो हो ही जाएंगे आबाद,
छूट जाएगा अपना शहर रैन बसेरा।

कभी ठाठे मारता बाहें फैलाए,
वह था शहर जगमगाए।
बिखर गया जाता देख काफ़िला ,
खड़ा है मौन अब सर झुकाए।

स्वमेत स्वरों अखंड राग में,
चहचहाते फूल और कलियां।
वीरान हो गई है अब तो,
मेरे शहर की वह गलियां।

आधे चांद से ही जब,
आ जाता था शहर में सवेरा।
उड़ चला परिंदा अब तो छोड़,
शहरों का रैन बसेरा।

शहरों की चांदी कमाई,
अब हो गई है मिट्टी।
जब भागे शहर छोड़कर शावक
क्या भेजेंगे अब कोई चिट्ठी।

संघर्षों से अब शहरों का,
क्या रूप फिर दमकेगा।
कब गुलज़ार होंगे बाज़ार,
कब रैन बसेरा चमकेगा।

✍डा.शुभ्रा वार्ष्णेय
       मुरादाबाद

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