दिखावा कितना आवश्यक

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*लेख*
दिखावा कितना आवश्यक

दिखावे में इतना कैसे रह लेते हो,
लगता है प्रकृति से ज्यादा खूबसूरती है वहां….

कितना सोचने पर मजबूर कर रही है न ये पंक्तियां।

आज दिखावा समाज में हर व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण होता चला जा रहा है। आखरी दिखावा है क्या वास्तविकता में एक ही कोशिश है समाज में अपनी और अपनी वस्तुओं की महत्वता प्रमाणित करने की।

क्या आपको नहीं लगता की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हर व्यक्ति अपने कर्म , अपना धर्म अपना परिवार व स्वयं को  भी सर्वश्रेष्ठ मानता है और समाज में भी सर्वश्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिए प्रयासरत रहता है।

शायद आज सभी लोग स्वयं को संतुष्ट नहीं करने में उत्सुक हैं वरन समाज की मनोवृति को संतुष्ट करने में ज्यादा समय ऊर्जा व धन खपा रहे हैं।

मैं सर्वश्रेष्ठ हूं ..मेरा कार्य उत्तम है.. मैं सबसे आगे हूं… मेरे धन का कोई सानी नहीं… मेरा तो ज्ञान सबसे ऊपर है। ऐसी न जाने अनगिनत कितनी ख्याल आप और मेरे सभी के मन में दिन-प्रतिदिन विचरण करते ही रहते हैं।

और इस बात को प्रमाणित करने के लिए हम हर तरह के आडंबर या दिखावा करते हैं चाहे हमें अपने श्रेष्ठ  वस्तु,  वाहन  व आभूषण का बखान करने मे कितनी ही ऊर्जा समय व धन व्यर्थ क्यों ना करना पड़े ।

कुछ लोग तो अपनी सीमाओं में रहकर ही दिखावे के तहत अपने धन व समय को लगाते हैं और कुछ लोग अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूर्ण करने के लिए गलत रास्ते अपना लेते हैं।

क्या आपने सोचा है कभी इस दिखावे में सबसे ज्यादा पीड़ित कौन है?

कटु जरूर है लेकिन सच्चाई यह है कि दिखावे में सबसे ज्यादा पीड़ित होता है मध्यम वर्ग का समाज।

उच्च वर्ग के समक्ष आने को और निम्न वर्ग को अपने अहंकार के तले दबाने में वह अपने धन ऊर्जा व समय को नष्ट करने में कतई पीछे नहीं हटता।

इस दिखावे में अपनापन कहीं पीछे छूट जाता है।

इस बात को इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि हर कोई जानता है घर का भोजन कितना उत्तम व पौष्टिक होता है और स्वयं तो स्वयं मेहमानों को भी अगर घर में तैयार भोजन कराया जाए तो वह अति उत्तम होगा लेकिन आ जाता है आगे दिखावा ।
जानते हुए भी  कि ‘फास्ट फूड’ विभिन्न पेय पदार्थ ‘कोल्ड ड्रिंक्स’ इत्यादि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, दिखावे के तहत विभिन्न तरह के सामान बाजार से मंगाए जाते हैं।

मेरी गाड़ी कहीं उसकी गाड़ी से छोटी न रह जाए इस सोच के चलते ही हम तुरंत महंगी गाड़ी ले लेते हैं चाहे हमें उसके लिए बैंक लोन ही क्यों न लेना पड़े।

बिना शिक्षा का सही रूप समझे भेड़ चाल के तहत महंगे स्कूल में बच्चों का ‘एडमिशन’ करा दिया जाए चाहे वह ‘फीस’ व ‘फैशन’ समझ में आए ना आए पर समाज को तो दिखाना है कि हमारा बच्चा किसी से कम नहीं।

दिखावे का भरपूर प्रदर्शन तो किसी विवाह समारोह में देखिए। दिखावा करते करते वधूपक्ष तो छोड़िए वर पक्ष की भी चाहे कमर टूट जाए लेकिन आडंबरों में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।

और अब तो दिखावे का नया ताजा उदाहरण है ‘मोबाइल फ़ोन’ ।किसी जमाने में सिर्फ बातचीत का पर्याय रहा फोन अब तो ‘स्टेटस सिंबल’ बन गया है।

चाहे फोन बदलना आवश्यक हो ना हो पर ‘लेटेस्ट वर्जन’ का तो फोन चाहिए ही चाहिए ।
बड़े तो बड़े,  बच्चों के हाथ में भी आप नए से नए ‘वर्जन’ को देख सकते हैं।

कपड़ों के तो कहने ही क्या। किसी जमाने में अलमारी की शोभा बढ़ाते हुए चंद कपड़े कब ढेर में बदल गए यह तो हमको खुद नहीं पता।

जिनके पास आवश्यकता से अधिक धन है वह अपने रुतबे को कायम करने के लिए और भी महंगे संसाधनों का उपयोग करते हैं।

चलिए आप ही बताइए समाज का ऐसा कौन सा वर्ग है जो दिखावे की बीमारी से अछूता ना हो।

सच पूछो तो इस दिखावे ने सबको एक तरह से अप्रत्यक्ष मनोरोगी ही बना दिया है। क्या मैंने कुछ गलत कह दिया… मनोरोगी यह शब्द मन को चुभ जाते हैं।

चलिए बताइए इस दिखावे को पूरा करने में आप और हम क्या नहीं लगे हुए हैं सुबह से शाम तक हमारे जीवन का उद्देश्य जीवन जीने में नहीं वरन श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम दिखने में समर्पित होता जा रहा है।

प्रतियोगी दौर में हर कोई आगे निकलना चाहता है और प्रगति ही तो जीवन को आगे ले जाती है पर अगर संतुलित ना रहकर वह आगे निकलने की दौड़ दिखावे में बदल जाती है तो बताइए किस की हानि है?

निसंदेह आपकी और हमारी…. दिखावा छीन लेता है मन का चैन शांति और स्थिरता और दे देता है बदले में बेचैनी व्याकुलता व उग्रता।

बड़े तो बड़े बच्चे भी इससे दूर नहीं है अपने साथियों में झूठा प्रदर्शन कर चाहे वह वस्त्र का हो या धन का उन्हें बहुत आनंद आता है।

त्योहार अब तो त्यौहार पर दिखावे की जो धूल जम जाती है उससे तो वह मुसीबत नजर आने लगते हैं। दिखावे के तहत इतना धन वह हो जाता है कि वह त्यौहार बोझ लगने लगता है। अब दिखावा कैसे ना करें ,पड़ोस में तो इतना धन खर्च होता है हम कैसे पीछे रहें।

मित्रों गहनता  से विचार करिए आभूषण धन वाहन यह सब दिखावे के वाहक हैं इनको उच्च कोटि का जुटाकर समाज में स्वयं को महत्वपूर्ण समझना नादानी है।

हमें यह भ्रम है कि कोई हमारी व्यवस्था को देखकर आकर्षित होता है अगर वह किसी के उपयोग का नहीं है तो वह सामने वाले के लिए कूड़े के समान है या फिर उसकी ईर्ष्या का कारण बन सकता है।

अंतर्मन से सोचिए समाज में किसको महत्व मिलता है। भले से आप की वैभवता को देख कर सामने आपको कोई भी कितना सराहे  लेकिन समाज में महत्व वे ही पाते हैं जो निस्वार्थ सेवा भाव व इंसानियत लिए हुए होते हैं।

अपने आप को बुद्धिमान समझ कर लोगों को अपनी तर्कशक्ति से दबाने वाला व्यक्ति ही सबसे बड़ी बुद्धि हीनता का परिचय देता है।

अगर बच्चों की सुख में भविष्य को सोचा जाए तो फिर कहने ही क्या  महंगी फीस व स्कूलों  का आडंबर स्वयं ही परे हट जाएगा।

विवाह में अगर वर वधु का ही ध्यान रखें और उनकी आने वाले जीवन के लिए धन संचित करने की सोचें तो फिर धन व्यर्थ ही कहा जाएगा।

अपने बचपन को याद करें कि मां ने हमें कैसे मेहनत करके साफ सुथरा घर के आटे से तैयार भोजन कराया है तो फिर हम अपने बच्चों को फास्ट फूड खिलाएंगे ही क्यों।

🌼जरा मैं से निकलकर हम पर तो आ जाइए देखिए दिखावा कितनी जल्दी छूमंतर हो जाएगा।🌼

✍डा.शुभ्रा वार्ष्णेय

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