मन का संक्रमण

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शीर्षक-मन का संक्रमण 

 

 “दादी हलवा” तीन वर्षीय आरव को जीना उतरकर अपनी तरफ आते देख कर शांति देवी एकदम से चिल्ला पड़ी, “ऊपर अपने घर जाओ नीचे क्यों आ रहे हो?”

“आप इन लोगों से साफ कह दीजिए मकान खाली करने के लिए” पत्नी का चिंतित स्वर देखकर शंभू दयाल ने कहा,” इतनी चिंता की कोई बात नहीं है सुरक्षा के नियमों का पालन कर डॉक्टर साहब आराम से ड्यूटी कर रहे हैं और घर भी नहीं आ रहे ऐसे में संक्रमण का डर नहीं है”

अपने घर का ऊपर का हिस्सा एक चिकित्सक के परिवार को किराए पर होने से आज शांति देवी संक्रमण के डर से उन्हें मकान से निकालने के पक्ष में थी बिना यह सोचे कि चिकित्सक पत्नी रश्मि को अपने दो वर्षीय पुत्र के साथ एकदम से नये घर के प्रबंध करने में कितनी कठिनाई आएगी। वह रश्मि से इस संदर्भ में आज अंतिम निर्णय लेने के लिए फोन करने ही वाली थी कि उनकी पुत्री सोनाक्षी का फोन आ गया जो दूसरे शहर में बैंक में कार्यरत अपने पति के साथ एक किराए के मकान में रहती थी। उसके स्वर में चिंता थी, “मम्मी मैं बहुत परेशान हूं, नोटों से संक्रमण ना हो जाए यह सोचकर मकान मालिक हमसे घर खाली करने को कह रहे हैं”

” पर दामाद जी तो दूसरे शहर में कार्यरत हैं तुम्हें रखने में उन्हें क्या समस्या है, कैसा मन है इन लोगों का” कहते हुए शांति देवी के शब्द उनके गले में अटक गए ।

वह सोचने लगी वह भी तो मन के संक्रमण से ही ग्रसित हैं। ऐसे समय में जब पति यहां नहीं है तो रश्मि को कितनी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा होगा, इस बात का विचार किए बिना वह स्वार्थ वश स्वयं के बारे में सोच रही थीं।

 वह आगे से दोनों का ख्याल रखेंगी। जो लोग अपनी जान की परवाह करे बगैर अपना धर्म निभा रहे हैं तो फिर उनकी सहायता को वह पीछे क्यों हटें।

अब उनके कदम रसोई घर की तरफ जा रहे थे, नन्हे आरव को हलवा बनाकर जो देना था।

 

✍डा.शुभ्रा वार्ष्णेय

    मुरादाबाद

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