कुदरत का कहर

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प्रकृति करती थी पोषण
मनुष्य ने किया शोषण
प्राकृतिक संसाधनों का
बहुत किया है दोहन

ये कुदरत है जनाब
रखती है सब हिसाब
बहुत कर ली मनमानी
अब देना होगा जबाब

रूठी है इस बार
कर रही है संहार
हद स्वीकार कर अपनी
करो तुम मान-मनुहार

स्वरचित
दीपाली पंत तिवारी ‘दिशा’

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