हमारा अतीत

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शैशव दशा में देश प्रायः जिस समय सब व्याप्त थे,
निःशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे।
संसार को पहले हमीं ने ज्ञान भिक्षा दान की,
आचार की, व्यापार की, व्यवहार की, विज्ञान की।

‘हाँ’ और ‘ना’ भी अन्य जन करना न जब थे जानते,
थे ईश के आदेश तब हम वेदमंत्र बखानते।
जब थे दिगंबर रूप में वे जंगलों में घूमते,
प्रासाद–केतन–पट हमारे चन्द्र को थे चूमते।

जिनकी महत्ता का न कोई पा सका है भेद ही,
संसार में प्राचीन सबसे हैं हमारे वेद ही।
प्रभु ने दिया यह ज्ञान हमको सृष्टि के आरंभ में,
है मूल चित्र पवित्रता का सभ्यता के स्तम्भ में।

विख्यात चारो वेद मानो चार सुख के सार हैं,
चारो दिशाओं में हमारे वे विजय ध्वज चार हैं।
वे ज्ञान गरिमागार हैं, विज्ञान के भंडार हैं,
वे पुण्य–पारावार हैं, आचार के आधार हैं।

                           ~ मैथली शरण गुप्त

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