गुनगुनी शाम

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4.6
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गुनगुनी शाम में
दूर किसी दरख़्त के नीचे,
जहाँ वो नीला अनंत आकाश
अपनी विशालता का परिचय देता हो,
उसी तरह हम- तुम बैठें हो
अपने हृदय में विशालता लिये;
एक दूसरे के प्रति समर्पित।
जहाँ प्रकृति हो शांत- निश्चल
चहचहाहट हो चिड़ियों की
कहीं दूर से आती हो वाहनों की आवाज,
कोई मीठी धुन बनकर धीरे-धीरे।
जहाँ हम खोल पाएं एक दूसरे के मन की परतें
और जाने खुद को पहले से ज्यादा;
गर मन में हो कोई गिले शिकवे
बहा दें हम उसे प्रेम रूपी धारा से।
वर्तमान के प्रति सजग और भविष्य की अनगिनत कल्पनाओं के साथ,
बिताएँ कुछ पल साथ में
जहाँ हमारे मौन में भी अभिव्यक्ति हो।
गुनगुनाएं कुछ साथ में
मुस्कुराहटों के साथ एक दूसरे को ताक़ते हुए;
पढ़े कुछ गज़ल कुछ कविताएँ
जिसमें प्रेम की अभिव्यक्ति दिलों की गहराई को छूती हो।
फिर, चले साथ में
एक नयी रवानगी, एक नये एहसास के साथ
जहाँ दिलों में चाह हो इस शाम को पुनः एक बार जीने की। 

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