ज़रूरत

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के कभी तो समझा होता… क्यूँ ख़ामोशी है आदत मेरी,
के कभी तो जाना होता… क्यूँ भर आती हैं आँखें मेरी।
के कभी तो देखा होता… क्यूँ बेचैन है ज़िन्दगी मेरी,
के कभी तो झांकी होती… जो ग़मगीन है दहलीज़ मेरी।
के कभी तो महसूस होती… ये बेतहाशा खलिश मेरी,
क्यों ना समझा? तुझे हो न हो… ज़रूरत मुझे तो है तेरी।

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