एक भावी महापुरुष का अंत ……

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हमारे बचपन की बात ही निराली थी ….वैसे हमारा बचपन शहर के सरस्वती शिशु मंदिर और फिर नानक चंद स्कूल में बीता ….जैसे आज के शिक्षकों में बच्चों को केरियर बनवाने की ललक होती है ….हमारे छुटपन में शिक्षकों में “महापुरुष “ तैयार करने की भयंकर चाहत हुआ करती थी …….उस समय अगर उनका बस चलता तो देश को पाँच – दस गांधी ,सुभाष या जेपी हर साल वो प्रति शिक्षक की दर से तैयार करके दे चुके होते …….उनके इस ख़ुराफ़ात के पीछे तात्कालिक महापुरुषों का भी कुछ षड्यंत्र था जो शिक्षकों की ज़िम्मेवारी राष्ट्र-चरित्र निर्माण “ जैसे आदर्श वाक्यों से बताते थे जिससे शिक्षक उद्दीपन में अपने छात्रों पर मेंढक” की तरह प्रैकटिकल को मचलने लगते थे …..
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हमारे मस्साहेब” भी गणित के टंकी और ट्रेन वाले दो प्रश्न करवाने के बाद आँखो में आँसू भर हमें गांधी और बिनोवा बनने को कहते ……….लेकिन हमारे बैच का कच्चा माल इस स्टेण्डर्ड का था कि शीघ्र ही अहिंसा का प्रवचन करते -करते वो ख़ौफ़नाक रूप धारण कर लेते और खुलेआम डंडे से मार-काट मचाते हुए कई सारे भावी गांधियो का मुँह और हाथ -पैर फुला डालते ……कहाँ शुरू में वो दूसरे गाल आगे करने की शिक्षा देते और फिर ख़ुद ही हाथ के साथ लात भी उठाने लगते ………….थोड़े दिनो में उन्हें समझ आ गया कि इस बैच से महापुरुष क्या …….ढंग से दसवीं पास करने वाले बच्चे भी तैयार करने मुश्किल हैं ……तो उन्होंने सार्वजनिक दुत्कार सभा बुला कर हमारे अभिभावकों के समक्ष अपने हथियार डाल दिए ….साथ भी ये भी एलान कर डाला कि ये लड़के देश के बोझ साबित होंगे , और देश का बोझ बढ़वाने के लिए हमारे अभिभावकों को भी लज्जित रहना चाहिए ….
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अच्छा, अभिभावकों में अधिकांश ऐसे थे जिन्होंने जेपी , बिनोवा को देख रखा था या फिर नेहरु , गांधी , सुभाष या भगत सिंह से जानलेवा ढंग से प्रेरित थे ……तो ख़ुद महापुरुष बनने का मौक़ा निकल जाने के प्रतिशोध स्वरूप वो अपने बच्चों को महापुरुष बना डालना चाहते थे …….उनके ज़माने में महापुरुष निकलते भी थोक में थे ……तो देश निर्माण के यज्ञ में आहुति ना डाल पाने की भावना मात्र से उन सबके चेहरे पर वास्तव में लज्जा का भाव आ चुका था ….

यही वो दिन था जब हमने अपने को किसी भी क़ीमत पर “महापुरुष” बनवाने का प्रण लिया और अकेले में मस्साहेब” से अपनी गुप्त इच्छा प्रकट की ………..जिसे सुनते ही गुरु जी ख़ौफ़नाक रूप से प्रसन्न हुए और तुरंत हमारे कोपी के पिछले पन्ने पर महापुरुष बनने के सूत्र लिखते गये …..जिनमे चीज़ें तो कई थीं मुख्य रूप से बिना तेल मसाला वाला खाना, प्रतिदिन योगाभ्यास और सुबह चार बजे उठ कर नहाना …….चाट, समोसे, जलेबी , चलचित्र, टीवी ….सब बंद ……उनका मानना था कि इस तरह के जीवन से स्वतः अच्छे विचार ही आएँगे और मेरा महापुरुष बनना तय हो जाएगा …….
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ख़ैर , हाफ़ पेंट योग के लिए ख़रीदा गया, चार बजे उठ के नहाना शुरू हुआ लेकिन चार पाँच दिन में ही मुझे महसूस हो गया कि सुबह इस तरह नहाने से मेरा प्राणांत निश्चित है …..और किसी भी भावी महापुरुष का बचपन में ठंड से अकड़ के मरना निहायत ही बेइज़्ज़ती की बात होती …..खाने में स्वाद की कमी से जीवन नीरस लगने लगा और पकौड़ी, जलेबी दूसरों को खाते देख मन ही मन अपने लिए निहायत ही मौलिक गालियाँ निकलने लगीं ………ख़्याल में भी मिथुन चक्रवर्ती ही आता रहा कि किस तरीक़े से वो साईकल के पीछे एसटेंनगन” की गोलियाँ बचा ले जाता है …….रही -सही कसर सातवें दिन हमारे फट गये हाफ़ पेंट ने पूरी कर दी …….तो फिर उस दिन रज़ाई के अंदर जा के ख़्याल आया कि आत्मा चाहे देर तक सोना, चाट -पकौड़ी और सिनेमा …..योग और परहेज़ तो इस नश्वर शरीर को ठीक करेंगे …अजर अमर तो आत्मा है क्यूँ ना पहले आत्मा की बात सुनी जाय ……..अच्छे विचार तो रज़ाई के अंदर भी लाये जा सकते है ………..वो दिन है , और आज का दिन …..फिर हम कभी उस महापुरुष” बनने वाले ज़ालिम पथ पे नहीं गये ……..
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और इस तरह एक भावी महापुरुष का बनना दुरूह परिस्थितियों की वजह से अनिश्चितकाल तक स्थगित हो .गया 😃😜😃

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